बर्फ़ में कराहती गौमाता : हिमाचल की सर्दी और भारत की कड़वी सच्चाई
बर्फ़ में कराहती गौमाता : आस्था, संवैधानिक सम्मान और आज की कड़वी सच्चाई
हिमाचल प्रदेश की बर्फ़ से ढकी पर्वतमालाएँ देखने में जितनी मनोहारी लगती हैं, उतनी ही पीड़ा अपने भीतर समेटे रहती हैं। शीतकाल के दौरान जब पूरा पहाड़ी क्षेत्र बर्फ़ की सफ़ेद चादर से ढक जाता है, तब केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि वे मूक प्राणी भी संघर्ष करते हैं जिन्हें हम गौमाता कहकर पूजते हैं।
आज हिमाचल के अनेक क्षेत्रों में बर्फ़ के बीच खड़ी, कांपती, भूखी और दम तोड़ती गायों को देखना केवल एक प्राकृतिक संकट नहीं, बल्कि हमारे समाज और शासन की संवेदनहीनता का आईना है।
गाय : केवल पशु नहीं, भारतीय सभ्यता की आत्मा
भारतीय संस्कृति में गाय को केवल एक पशु नहीं माना गया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, महाभारत और पुराणों में गाय को अघन्या (जिसे मारा न जाए), कामधेनु और माता कहा गया है।
- भगवान श्रीकृष्ण को गोपाल कहा गया — वे गौवंश के रक्षक और संवर्धक के रूप में पूजित हैं।
- भगवान शिव का वाहन नंदी गौवंश का ही प्रतीक है, जो शक्ति, धैर्य और धर्म का प्रतिनिधित्व करता है।
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गाय को “राज्यमाता” का दर्जा देने वाले राज्य:
- महाराष्ट्र — वर्ष 2024 में गाय को आधिकारिक रूप से राज्यमाता घोषित किया गया
- राजस्थान — राज्य सरकार द्वारा गाय को राज्यमाता का सम्मान दिया गया
- हरियाणा — गाय को गौ माता के रूप में विशेष संरक्षण और सम्मान प्राप्त है
- छत्तीसगढ़ — गौसेवा एवं गौधन न्याय योजनाओं के तहत गाय को विशेष सामाजिक दर्जा
(ध्यान देने योग्य है कि सभी राज्यों में यह दर्जा संविधानिक नहीं बल्कि नीतिगत/प्रशासनिक निर्णय के रूप में दिया गया है)
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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48 (Article 48):
यह अनुच्छेद राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of State Policy) के अंतर्गत आता है।अनुच्छेद 48 के अनुसार राज्य का यह दायित्व है कि:
- कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर संगठित करे
- विशेष रूप से गाय, बछड़े तथा अन्य दुग्ध देने वाले और श्रम करने वाले पशुओं के वध पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करे
हालांकि यह अनुच्छेद न्यायालय में सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि गौवंश संरक्षण भारतीय राज्य की संवैधानिक सोच का हिस्सा है।
प्रश्न यह है — यदि गाय माता है, तो क्या माता को बर्फ़ में मरने के लिए छोड़ देना धर्म है?
आस्था से स्वार्थ तक: गौवंश के साथ व्यवहार की कड़वी सच्चाई
आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समाज के एक बड़े हिस्से ने गाय को आस्था का नहीं, केवल लाभ का साधन बना लिया है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसे घर का सदस्य कहा जाता है, पूजा की जाती है और “गौमाता” के नाम पर सम्मान दिया जाता है। लेकिन जैसे ही वही गाय दूध देना कम कर देती है, बीमार हो जाती है या बूढ़ी हो जाती है, तो वही लोग उसे घर से बाहर सड़क पर छोड़ देते हैं। न तो उसके उपचार की चिंता की जाती है, न उसके भरण-पोषण की— वह गाय फिर दुर्घटनाओं, भूख, प्लास्टिक खाने और अपमानजनक मृत्यु के लिए छोड़ दी जाती है।
इससे भी अधिक अमानवीय सच्चाई यह है कि नर बछड़ों (Male Calf) को कई स्थानों पर जन्म लेते ही बोझ मान लिया जाता है। क्योंकि वे दूध नहीं देते, इसलिए उन्हें पालना घाटे का सौदा समझा जाता है। परिणामस्वरूप कई मामलों में नर बछड़ों को जन्म के तुरंत बाद मार दिया जाता है, या फिर उन्हें ऐसे हालात में छोड़ दिया जाता है जहाँ उनका जीवित रहना लगभग असंभव हो। यह सब केवल इसलिए किया जाता है ताकि गाय को अधिक दुहा जा सके और अधिक दूध निकाला जा सके।
यह व्यवहार स्पष्ट करता है कि समस्या केवल कानून या संविधान की नहीं है— समस्या मानसिकता की है। जिस गाय को हम धार्मिक मंचों पर माता कहते हैं, उसी के साथ व्यवहार बाजार की वस्तु जैसा किया जाता है। जब तक गाय कमाई है, तब तक सम्मान है— और जब वह खर्च बन जाती है, तो उसे त्याग दिया जाता है। यही सबसे बड़ा नैतिक विरोधाभास है, जो किसी भी आँकड़े, कानून या भाषण से कहीं अधिक भयावह है।
हिमाचल की सर्दी और गौवंश की त्रासदी
हिमाचल प्रदेश के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान:
- 2 से 3 महीने तक ज़मीन बर्फ़ से ढकी रहती है
- घास और चारा उपलब्ध नहीं होता
- अनेक पंचायतों में गौशालाओं की कमी है
- दूध न देने वाली गायों को खुला छोड़ दिया जाता है
परिणामस्वरूप हर वर्ष दर्जनों नहीं, बल्कि सैकड़ों गायें भूख, ठंड और दुर्घटनाओं का शिकार बनती हैं।
उनका अपराध क्या है? दूध देना बंद कर देना? या बूढ़ी हो जाना?
पूजा और व्यवहार का विरोधाभास
हम सुबह गौमाता की पूजा करते हैं, और शाम को उन्हें सड़क पर छोड़ देते हैं।
- दूध चाहिए — गाय हमारी
- दूध कम हुआ — गाय बोझ
- बीमार हुई — छोड़ दो
- बूढ़ी हुई — सड़क पर
यही सबसे बड़ा धार्मिक पाखंड है, जिसने गौसंरक्षण को केवल नारे तक सीमित कर दिया है।
भारत : गौपूजा का देश या बीफ़ निर्यातक?
यह एक कड़वा सत्य है कि आज भारत दुनिया के बड़े बीफ़ निर्यातकों में शामिल है। सामान्यतः यह तर्क दिया जाता है कि भारत से निर्यात होने वाला अधिकांश मांस भैंस (Buffalo / Carabeef) का होता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बीफ़ निर्यात केवल भैंस के मांस तक सीमित नहीं है। कुछ मात्रा में गाय के मांस (Cow Beef) का निर्यात भी विभिन्न कानूनी, क्षेत्रीय और अप्रत्यक्ष माध्यमों से होता है।
📊 भारत का बीफ़ निर्यात : प्रमुख आँकड़े
- कुल निर्यात मात्रा: भारत हर वर्ष लगभग 12–13 लाख मीट्रिक टन बीफ़ का निर्यात करता है, जिसमें भैंस का मांस प्रमुख भाग है, परंतु गाय का मांस भी पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है।
- आर्थिक योगदान: इस बीफ़ निर्यात से भारत को लगभग USD 4–4.5 बिलियन (करीब ₹33,000–₹36,000 करोड़) की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
- वैश्विक रैंक: भारत लगातार विश्व के शीर्ष 2–3 बीफ़ निर्यातक देशों में शामिल रहा है और कई वर्षों तक दूसरे सबसे बड़े बीफ़ निर्यातक के रूप में दर्ज किया गया।
🐄 भैंस और गाय के मांस का अंतर
आधिकारिक दस्तावेज़ों में भारत का निर्यात प्रायः “Buffalo Meat” के रूप में दर्ज किया जाता है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह मानना कि निर्यात में गाय का मांस बिल्कुल नहीं है, एक अधूरा और भ्रामक निष्कर्ष होगा।
- कुछ राज्यों में गाय के वध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है
- कुछ मामलों में मांस की श्रेणीकरण प्रक्रिया अस्पष्ट रहती है
- अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इसे सामान्यतः “Beef” ही माना जाता है
📍 प्रमुख निर्यातक राज्य
- उत्तर प्रदेश – सबसे बड़ा योगदान
- महाराष्ट्र
- पंजाब
- आंध्र प्रदेश
- तेलंगाना
🌍 प्रमुख आयातक देश
- वियतनाम
- मलेशिया
- मिस्र
- इंडोनेशिया
- इराक
- मध्य पूर्व और अफ्रीका के अन्य देश
यही वह विरोधाभास है जहाँ एक ओर समाज में गाय की रक्षा और आस्था की बात की जाती है, तो दूसरी ओर भारत वैश्विक बाज़ार में बीफ़ निर्यातक के रूप में स्थापित है। यह विषय केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि नैतिकता, नीति और दोहरे मापदंडों का भी है।
सवाल केवल यह नहीं है कि मांस भैंस का है या गाय का— सवाल यह है कि क्या हम सच्चाई को स्वीकार करने का साहस रखते हैं?
जब एक ओर हम गाय को माता कहते हैं, और दूसरी ओर गायें भूख से मरती हैं, तो यह केवल नीति की नहीं, मानवता की विफलता है।
धर्म, राजनीति और गौमाता : एक असहज प्रश्न
यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जब राजनीतिक दल चुनाव के समय धर्म के नाम पर वोट माँगते हैं, गौमाता को मंचों से माता कहते हैं, पोस्टरों और नारों में उनका गुणगान करते हैं, तो फिर वही राजनीतिक व्यवस्था गौहत्या रोकने, गाय को सड़क पर छोड़ने वालों पर सख़्त कानून बनाने से क्यों कतराती है?
यदि गाय वास्तव में माता है, तो केवल वध पर कानून पर्याप्त क्यों? उस व्यक्ति पर कानून क्यों नहीं जो दूध देना बंद करने पर गाय को सड़क पर छोड़ देता है? उस व्यापारी पर दंड क्यों नहीं जो गाय को भूख और ठंड के लिए मजबूर करता है?
धर्म यदि केवल वोट का साधन बन जाए और करुणा नीति का हिस्सा न बने, तो गौमाता केवल भाषणों में सुरक्षित रहती है, हकीकत में नहीं। आज प्रश्न किसी एक दल का नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र का है — क्या गौमाता सच में आस्था का विषय है, या केवल चुनावी एजेंडा?
देवभूमि हिमाचल और देवताओं की चेतावनी
हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। यहाँ के अनेक देवी-देवताओं की परंपराओं और देववाणियों में समय-समय पर चेतावनी दी गई है कि गौवंश की उपेक्षा प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ देगी।
मान्यता है कि गौहत्या, गौउपेक्षा और गौभूख तीनों महापाप हैं, जिनके परिणाम प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आते हैं।
गाय और पर्यावरण का गहरा संबंध
गाय केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- गोबर से जैविक खेती
- गोमूत्र से प्राकृतिक कीटनाशक
- गौचर भूमि से पारिस्थितिकी संतुलन
जब एक गाय मरती है, तो केवल एक प्राणी नहीं, एक पूरी परंपरा और संतुलन टूटता है।
योजनाओं की आड़ में मुनाफ़ा: गौशाला नहीं, केवल काग़ज़ों में गाय
एक और गंभीर तथा चिंताजनक वास्तविकता यह है कि आज कुछ लोग सरकारी योजनाओं—विशेषकर मनरेगा (MGNREGA) जैसी योजनाओं—का उपयोग गौसेवा के नाम पर निजी लाभ के लिए कर रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत कई राज्यों में गाय के लिए शेड (Cowshed / गौशाला) बनाने का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य पशुओं को सुरक्षित आश्रय देना और ग्रामीण आजीविका को सशक्त करना है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कई मामलों में जिन घरों में एक भी गाय नहीं है, वहाँ भी काग़ज़ों में गौशेड बना दिए जाते हैं। योजना की राशि निकाल ली जाती है, मजदूरी का भुगतान हो जाता है, लेकिन जिस गाय के नाम पर यह ढांचा खड़ा किया गया, वह कभी वहाँ आई ही नहीं।
कुछ स्थानों पर तो स्थिति यह है कि गौशेड केवल अनाज रखने, लकड़ी जमा करने या फिर पूरी तरह खाली पड़े ढांचे बनकर रह जाते हैं। इस प्रकार गौवंश संरक्षण की भावना काग़ज़ों, फोटो और भुगतान रजिस्टर तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक गायें आज भी सड़कों पर भटकती दिखाई देती हैं।
यह केवल भ्रष्टाचार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का भी प्रमाण है जहाँ गाय को सेवा का विषय नहीं, सरकारी धन निकालने का माध्यम बना दिया गया है। जब योजनाएँ ज़मीन पर ईमानदारी से लागू नहीं होतीं, तो न गौवंश का कल्याण होता है और न ही समाज की नैतिक जिम्मेदारी पूरी होती है।
समाधान : सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी
यह समस्या केवल सरकार की नहीं, और केवल समाज की भी नहीं, यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
- ठंडे क्षेत्रों में शीतकालीन गौ-आश्रय
- हर पंचायत में गौशाला अनिवार्य
- गाय छोड़ने पर कड़ा दंड
- सर्दियों के लिए चारा बैंक
- नारे नहीं, वास्तविक बजट और निगरानी
अंतिम शब्द : माता को बचाइए
बर्फ़ में खड़ी कांपती हुई गाय हमसे कुछ नहीं मांगती, वह केवल देखती है — क्या यही वह समाज है जो उसे माता कहता था?
यदि आज भी हम चुप रहे, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा जिसने गौमाता को बर्फ़ में मरने दिया।
निर्णय हमारा है — पूजा केवल शब्दों में, या करुणा कर्मों में।

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