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Plastic Pollution in the Himalayas: Climate Change, Microplastics and the Future of Himachal Pradesh

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Plastic Pollution in the Himalayas: How Everyday Wrappers Are Destroying Our Mountains and Contributing to Climate Change From plastic food packaging and empty water bottles to microplastics in glaciers and mountain rivers, the plastic crisis is threatening the ecological future of the Himalayas. Introduction: The Mountains Are Becoming a Dumping Ground The Himalayas are among the most ecologically sensitive mountain systems on Earth. They are the source of countless rivers, support extraordinary biodiversity, regulate regional water systems and provide livelihoods to millions of people. For generations, mountain communities have lived in close relationship with nature. Traditional lifestyles depended on locally available resources, reusable household materials, natural food products and a relatively low-waste way of living. But today, a disturbing transformation is visible across many Himalayan tourist destinations. Walk along a mountain road, visit a popular trekkin...

नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।। हिमाचल की देव परम्पराओं में मानवीय हस्तक्षेप का प्रश्न।

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नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।। देवता की स्थापित नीतियों और परंपराओं में मनुष्य का बढ़ता हस्तक्षेप प्रकृति अपनी एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है। सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा से उदय होकर पश्चिम में अस्त होता है। नदियां पर्वतों से निकलकर अपने प्राकृतिक ढलान के अनुसार आगे बढ़ती हुई समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था, मर्यादा और नियम हैं। मनुष्य अपनी सुविधा के अनुसार इन नियमों को निर्धारित नहीं करता, बल्कि स्वयं इन्हीं नियमों के अधीन रहकर अपना जीवन संचालित करता है। इसी प्रकार हिमाचल की देवसंस्कृत ि में भी प्रत्येक देवी-देवता की अपनी विशिष्ट व्यवस्था, मान्यताएं, नीतियां, नियम और परंपराएं रही हैं। यहां देवता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहे हैं। गांवों और क्षेत्रों के अनेक महत्वपूर्ण कार्य देवता की मान्यता, आदेश और परंपरागत व्यवस्था के अनुसार संपन्न होते आए हैं। इसी देवसंस्कृति में एक कथन पीढ़ियों से प्रचलित है, जो बाहरी सिराज क्षेत्र में स्थानीय बोली के अनुसार इस प्रक...

ठारा करडू का वास्तविक अर्थ क्या है? कुल्लू की पहाड़ी भाषा और देवसंस्कृति

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ठारा करडू: कुल्लू की पहाड़ी भाषा में अनेकता का अर्थ और देवसंस्कृति का वास्तविक स्वरूप ठारा करडू (Thara Kardu) कुल्लू की देवसंस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पारंपरिक शब्द है। इसकी व्याख्या को लेकर अलग-अलग धारणाएं प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे 18 देवताओं से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुल्लू की स्थानीय पहाड़ी बोली, गुरुवाणी और देवपरंपरा में इसके व्यापक अर्थ को समझने के लिए कई महत्वपूर्ण उदाहरण मौजूद हैं। इस लेख में हम ठारा करडू को किसी एक मान्यता के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा, मौखिक परंपरा, कुल्लू के देवसमाज और मौलूराम ठाकुर की पुस्तक कुल्लू दशहरा और देव परम्पराएं में दर्ज ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर समझने का प्रयास करेंगे। विषय सूची ठारा करडू का परिचय ठारा शब्द का पहाड़ी भाषा में अर्थ स्थानीय बोली के वास्तविक उदाहरण करडू शब्द का अर्थ गुरुवाणी में ठारा करडू ठारा करडू की सौह मौलूराम ठाकुर का ऐतिहासिक अध्ययन 2005 का ठारा करडू सम्मेलन 18 देवताओं की सूचियों पर उठे प्रश्न नृसिंह की अध्यक्षता कुल्लू की विशाल देवपरंपरा कुल्लू की विशाल देवपरंपरा के संद...