नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।। हिमाचल की देव परम्पराओं में मानवीय हस्तक्षेप का प्रश्न।
नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।।
देवता की स्थापित नीतियों और परंपराओं में मनुष्य का बढ़ता हस्तक्षेप
प्रकृति अपनी एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार संचालित होती है। सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा से उदय होकर पश्चिम में अस्त होता है। नदियां पर्वतों से निकलकर अपने प्राकृतिक ढलान के अनुसार आगे बढ़ती हुई समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं। प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था, मर्यादा और नियम हैं। मनुष्य अपनी सुविधा के अनुसार इन नियमों को निर्धारित नहीं करता, बल्कि स्वयं इन्हीं नियमों के अधीन रहकर अपना जीवन संचालित करता है।
इसी प्रकार हिमाचल की देवसंस्कृति में भी प्रत्येक देवी-देवता की अपनी विशिष्ट व्यवस्था, मान्यताएं, नीतियां, नियम और परंपराएं रही हैं। यहां देवता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र में रहे हैं। गांवों और क्षेत्रों के अनेक महत्वपूर्ण कार्य देवता की मान्यता, आदेश और परंपरागत व्यवस्था के अनुसार संपन्न होते आए हैं।
इसी देवसंस्कृति में एक कथन पीढ़ियों से प्रचलित है, जो बाहरी सिराज क्षेत्र में स्थानीय बोली के अनुसार इस प्रकार कहा जाता है—
नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।।
इसका भाव है कि नई नीति-नियम नहीं बनाने और पुरानी नीति-नियमों को नहीं छोड़ना। भीतरी सिराज और अन्य क्षेत्रों में भी अपनी-अपनी स्थानीय बोलियों के अनुसार इसी भाव को गुरवाणी के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है।
यह कथन अपने आप में एक गंभीर सीख समेटे हुए है। यह केवल पुरानी परंपराओं को याद करने की बात नहीं करता, बल्कि देवता की स्थापित नीतियों और मर्यादाओं को बनाए रखने की ओर संकेत करता है।
लेकिन आज प्रश्न यह है कि जब हमारी देवसंस्कृति में पीढ़ियों से यह सीख दी जाती रही है, तो फिर मनुष्य अपनी सुविधा, इच्छा और स्वार्थ के अनुसार देवता की स्थापित व्यवस्था में हस्तक्षेप क्यों कर रहा है?
जगती-पुछ में भी सामने आई यही सीख
इस कथन की गंभीरता को समझने के लिए कुल्लू की देवपरंपरा में वर्णित एक ऐतिहासिक जगती-पुछ का उदाहरण महत्वपूर्ण है।
मोलू राम ठाकुर द्वारा लिखित पुस्तक कुल्लू दशहरा और देव परम्पराएं के पृष्ठ 64 पर एक जगती-पुछ का विवरण मिलता है। इसमें अनेक देवी-देवताओं के एकत्रित होने और गुरवाणी के माध्यम से अपनी बात रखने का उल्लेख किया गया है।
इस प्रसंग में लेखक के अनुसार, देवताओं ने अनेक विषयों पर अपने वचन कहे, लेकिन एक बात पर सभी ने एकमत होकर अपनी बात रखी। पुस्तक में दर्ज शब्द हैं—
ओखी पई, ओखी देन्दे माता, पुराणी नीति छोड़दे हेसती, नई नीति लाते हेसती। राज आओ असे पिछे।
इसका भावार्थ है कि कठिनाई आई है तो धैर्य रखो, पुरानी नीति मत छोड़ो, नई नीति मत अपनाओ, राज आगे आए और हम उसके पीछे चलेंगे।
लेखक इस प्रसंग में स्पष्ट करते हैं कि देवताओं ने दशहरे की प्राचीन परंपरा को उसी रूप में बनाए रखने और उसमें फेरबदल न करने की बात कही थी।
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह केवल किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय के रूप में वर्णित नहीं है, बल्कि पुस्तक में एक सामूहिक जगती-पुछ के प्रसंग के रूप में दर्ज है।
इस उदाहरण को रखने का उद्देश्य यह नहीं कि हर देवता के प्रत्येक नियम को इसी एक निर्णय से प्रमाणित कर दिया जाए, बल्कि यह समझना है कि हमारी देवपरंपरा में स्थापित नीतियों और पुरानी मर्यादाओं को कितना महत्व दिया जाता रहा है।
जब एक जगती-पुछ के प्रसंग में भी पुरानी नीति को न छोड़ने और नई नीति न अपनाने की बात सामने आती है, तो आज हमें अपनी वर्तमान गतिविधियों पर विचार करने की आवश्यकता क्यों नहीं होनी चाहिए?
क्या मनुष्य अपनी सुविधा के अनुसार देवता की व्यवस्था बदल सकता है?
आज का मनुष्य अपनी जीवनशैली के अनुसार अनेक सुविधाएं अपना रहा है। आवागमन के साधन बदले हैं, रहन-सहन बदला है और जीवन की आवश्यकताएं भी बदली हैं। इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन प्रश्न तब उत्पन्न होता है, जब मनुष्य अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं को देवता की स्थापित परंपराओं पर भी लागू करने लगता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को पैदल चलने में कठिनाई है, तो वह अपनी आवश्यकता के अनुसार वाहन का उपयोग कर सकता है। लेकिन क्या उसकी इस व्यक्तिगत आवश्यकता के कारण उसके साथ चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति की चलने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी? क्या वह दूसरे के पैरों को बांध सकता है, केवल इसलिए कि वह स्वयं नहीं चल सकता?
निश्चित रूप से नहीं।
फिर मनुष्य की अपनी सुविधा को देवता की परंपरा बदलने का आधार कैसे बनाया जा सकता है?
यदि किसी देवता की स्थापित परंपरा में पैदल यात्रा, निर्धारित पड़ाव या कोई विशेष विधि रही है, तो केवल मानवीय सुविधा के आधार पर उसमें बदलाव करना कितना उचित है? हां, विशेष परिस्थितियों में किसी आवश्यक परिवर्तन का प्रश्न अलग हो सकता है, लेकिन उसका आधार संबंधित देवता की परंपरागत व्यवस्था और मान्यता होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की मनमर्जी।
मनुष्य की सुविधा और देवता की मर्यादा को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
मनुष्य सेवक है या व्यवस्था का स्वामी?
हिमाचल की देवसंस्कृति में गुर, कारदार, पुजारी, भंडारी, बजंतरी और अन्य देव कारकूनों की अपनी-अपनी भूमिकाएं रही हैं। ये भूमिकाएं देवता की व्यवस्था को संचालित करने और उसकी परंपराओं को आगे बढ़ाने से जुड़ी हैं।
लेकिन हमें यह भी विचार करना होगा कि कहीं इन जिम्मेदारियों के निर्वहन में व्यक्तिगत इच्छाएं, प्रतिष्ठा, आर्थिक हित अथवा आधुनिक सुविधाएं अधिक प्रभावी तो नहीं होती जा रहीं?
- क्या किसी व्यक्ति को कारदार या अन्य पद मिलने से देवता की स्थापित नीति बदलने का अधिकार भी मिल जाता है?
- क्या देवता की सेवा करने का अर्थ देवता की व्यवस्था पर अपना अधिकार स्थापित करना है?
- क्या पहले मनुष्य देवता की मान्यता के अनुसार अपने कार्य करता था और आज धीरे-धीरे देवता की व्यवस्था को मनुष्य की इच्छा के अनुसार ढालने का प्रयास हो रहा है?
ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति या पद के विरुद्ध नहीं हैं। ये हमारी पूरी देवव्यवस्था के आत्ममंथन से जुड़े प्रश्न हैं।
क्योंकि किसी व्यवस्था का संचालन करना और स्वयं को उस व्यवस्था का स्वामी समझ लेना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
फिर मनुष्य कहता है कि देवता में पहले जैसा तप नहीं रहा!
यहां सबसे गंभीर प्रश्न हमारे अपने आचरण से जुड़ता है।
जब हम स्वयं स्थापित परंपराओं में परिवर्तन करने लगें, पुरानी नीतियों की अनदेखी करें और अपनी सुविधा को प्राथमिकता दें, तब बाद में यह कहना कि देवता में पहले जैसा तप, प्रभाव या शक्ति नहीं रही, क्या उचित है?
देवता के तप और शक्ति के विषय में मनुष्य अपनी सीमित समझ से अंतिम निर्णय कैसे दे सकता है?
क्या हमें पहले यह नहीं देखना चाहिए कि हमने स्वयं देवता की मर्यादा और परंपराओं के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का कितना पालन किया है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम देवता की व्यवस्था को अपनी इच्छानुसार बदलते जा रहे हैं और फिर उसी व्यवस्था में आए बदलावों के लिए देवता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं?
देवता की परंपराओं का संरक्षण केवल उत्सवों में रथ सजाने, निशान उठाने या मंदिरों में पूजा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक संरक्षण उनकी स्थापित नीतियों, मर्यादाओं और परंपराओं के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी से जुड़ा है।
आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन क्या अपनी मूल पहचान खोकर?
यहां हमारा उद्देश्य आधुनिकता का विरोध करना नहीं है। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और कुछ व्यवस्थाओं में आवश्यक परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। लेकिन प्रत्येक परिवर्तन को उचित ठहराने के लिए केवल आधुनिकता या सुविधा का नाम पर्याप्त नहीं हो सकता।
यह समझना आवश्यक है कि कौन-सी परंपरा किस आधार पर स्थापित हुई, उसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है तथा उसमें परिवर्तन की स्वीकृत प्रक्रिया क्या रही है।
किसी एक देवता की परंपरा दूसरे देवता पर लागू नहीं की जा सकती। प्रत्येक देवता की अपनी विशिष्ट पहचान और व्यवस्था है। इसलिए किसी भी बदलाव पर विचार करते समय संबंधित देवता की अपनी परंपरा को ही आधार बनाना होगा।
हमारी देवसंस्कृति की सुंदरता भी इसी विविधता में निहित है।
अंततः विचार करने योग्य बात
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम केवल अपनी प्राचीन परंपराओं का गुणगान करते रहें, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि उनके मूल भाव को समझें और अपने आचरण में भी उतारें।
यदि पीढ़ियों से हमें यह सीख दी जाती रही है कि नई नीति नहीं बनानी और पुरानी नीति नहीं छोड़नी, तो हमें यह अवश्य विचार करना चाहिए कि आज हम उस सीख के कितने अनुरूप चल रहे हैं।
देवता की व्यवस्था में मनुष्य की भूमिका क्या है? क्या वह उस व्यवस्था का पालनकर्ता और संरक्षक है या अपनी सुविधा के अनुसार उसका स्वरूप निर्धारित करने वाला?
यह प्रश्न आज प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए है, जो स्वयं को देवसंस्कृति का अनुयायी और संरक्षक मानता है।
देवता की परंपरा में परिवर्तन करने से पहले हमें यह अवश्य विचार करना चाहिए कि क्या हम वास्तव में किसी आवश्यक परिस्थिति का समाधान कर रहे हैं या केवल अपनी सुविधा को देवता की मर्यादा से ऊपर रख रहे हैं।
आखिरकार, देवसंस्कृति केवल हमारी पहचान नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है।
देवता की मर्यादा को अपनी सुविधा के अनुसार ढालना नहीं, बल्कि उसकी स्थापित परंपराओं का सम्मान और संरक्षण करना ही हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
और इसी संदर्भ में पीढ़ियों से कही जाती रही वह सीख आज भी उतनी ही विचारणीय है—
नौइ ने लानी, परानी ने छाडनी।।
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